Powerfull Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra | श्री चंद्रप्रभु जी पूजा देहरा तिजारा

Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra : श्री 1008 आठवे तीर्थंकर चन्द्रप्रभ स्वामी ( देहरे वाले तिजारा ) पूजा जैन धरम की श्रेष्ठ भक्तिमय पूजा आप सभी के लिए. ….. यह अतिशयकारी तीर्थ राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है।  यहाँ हज़ारों भक्तों का प्रतिदिन आना होता है। आप भी आये दर्शनं पूजन कर जीवन को धन्य बनाये।

Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra

– श्री चंद्रप्रभु जी पूजा देहरा –

शुभ पुण्य-उदय से ही प्रभुवर! दर्शन तेरा कर पाते हैं |
केवल दर्शन से ही प्रभु, सारे पाप मेरे कट जाते हैं ||
देहरे के चंद्रप्रभ-स्वामी! आह्वानन करने आया हूँ |
मम हृदय-कमल में आ तिष्ठो! तेरे चरणों में आया हूँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट् (आह्वानम्)
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सत्रिधिकरण)
Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra – (अथाष्टक)
भोगों में फँसकर हे प्रभुवर! जीवन को वृथा गँवाया है |
इस जन्म-मरण से मुझे नहीं, छुटकारा मिलने पाया है ||
मन में कुछ भाव उठे मेरे, जल झारी में भर लाया हूँ |
मन के मिथ्या-मल धोने को, चरणों में तेरे आया हूँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
निज-अंतर शीतल करने को,चंदन घिसकर ले आया हूँ |
मन शांत हुआ ना इससे भी, तेरे चरणों में आया हूँ ||
क्रोधादि कषायों के कारण, संतप्त-हृदय प्रभु मेरा है |
शीतलता मुझको मिल जाये, हे नाथ! सहारा तेरा है ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
पूजा में ध्यान लगाने को, अक्षत धोकर ले आया हूँ |
चरणों में पुंज चढ़ाकर के, अक्षयपद पाने आया हूँ ||
निर्मल आत्मा होवे मेरी, सार्थक पूजा तब तेरी है |
निज शाश्वत अक्षयपद पाऊँ, ऐसी प्रभु विनती मेरी है ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
पर-गंध मिटाने को प्रभुवर, यह पुष्प सुगंधी लाया हूँ |
तेरे चरणों में अर्पित कर, तुम-सा ही होने आया हूँ ||
हे चन्द्रप्रभु! यह अरज मेरी, भवसागर पार लगा देना |
यह काम-अग्नि का रोग बड़ा, छुटकारा नाथ दिला देना ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
दु:ख देती है तृष्णा मुझको, कैसे छुटकारा पाऊँ मैं |
हे नाथ! बता दो आज मुझे, चरणों में शीश झुकाऊँ मैं ||
यह क्षुधा मिटाने को प्रभुवर, नैवेद्य बनाकर लाया हूँ |
हे नाथ! मिटा दो क्षुधा मेरी, भव-भव में फिरता आया हूँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय क्षुधा रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
यह दीपक की ज्योति प्यारी, अंधियारा दूर भगाती है |
पर यह भी नश्वर है प्रभुवर, झंझा इसको धमकाती है ||
हे चंद्रप्रभु! दे दो ऐसा, दीपक अज्ञान मिटा डाले |
मोहांधकार हो नष्ट मेरा, यह ज्योति नर्इ मन में बाले ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
शुभ धूप दशांग बना करके, पावक में खेऊँ हे प्रभुवर |
क्षय कर्मों का प्रभु हो जावे, जग का झंझट सारा नश्वर ||
हे चंद्रप्रभु! अन्तर्यामी, कैसे छुटकारा अब पाऊँ |
हे नाथ! बता दो मार्ग मुझे, चरणों पर बलिहारी जाऊँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
पिस्ता बादाम लवंगादिक, भर थाली प्रभु मैं लाया हूँ |
चरणों में नाथ चढ़ा करके, अमृत-रस पीने आया हूँ ||
करुणा के सागर दया करो, मुक्ति का मारग अब पाऊँ |
दे दो वरदान प्रभु ऐसा, शिवपुर को हे प्रभुवर जाऊँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
जल चंदन अक्षत पुष्प चरु, दीपक घृत से भर लाया हूँ |
दस-गंध धूप फल मिला अर्घ ले, स्वामी अति-हरषाया हूँ ||
हे नाथ! अनर्घ्य-पद पाने को, तेरे चरणों में आया हूँ |
भव-भव के बंध कटें प्रभुवर! यह अरज सुनाने आया हूँ ||
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।

Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra – पंचकल्याणक-अर्घ्यावली

(शंभु छन्द)
जब गर्भ में प्रभुजी आये थे, इन्द्रों ने नगर सजाया था |
छ: मास प्रथम ही आकर के, रत्नों का मेह बरसाया था ||
तिथि चैत्र-वदी-पंचम प्यारी, जब गर्भ में प्रभुजी आये थे |
लक्ष्मणा माता को पहले ही, सोलह सपने दिखलाये थे ||
ॐ ह्रीं चैत्र-कृष्ण-पंचम्यां गर्भमंगल-मंडिताय श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
शुभ-बेला में प्रभु जन्म हुआ, वदि-पौष-एकादशि थी प्यारी |
श्री महासेन-नृप के घर में, हुर्इ जय-जयकार बड़ी भारी ||
पांडुकशिला पर अभिषेक किया, सब देव मिले थे चतुर्निकाय |
सो जिनचंद्र जयो जग-माँहीं, विघ्नहरण और मंगलदाय ||
ॐ ह्रीं पौष-कृष्ण-एकादश्यां जन्ममंगल-मंडिताय श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
जग के झंझट से मन ऊबा, तप की ली प्रभुजी ने ठहराय |
पौष-वदी-ग्यारस को इंद्र ने, तप-कल्याण कियो हरषाय ||
सर्वर्तुक-वन में जाय विराजे, केशलोंच जिन कियो हरषाय |
देहरे के श्री चंद्रप्रभु को, अर्घ्य चढ़ाऊँ नित्य बनाय ||
ॐ ह्रीं पौष-कृष्ण-एकादश्यां तपोमंगल-मंडिताय श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।३।
फाल्गुन-वदी-सप्तमी के दिन, चार घातिया घात महान |
समवसरण-रचना हरि कीनी, ता दिन पायो केवलज्ञान ||
साढ़े आठ योजन परमित था, समवसरण श्री जिन भगवान |
ऐसे श्री जिन चंद्रप्रभ को, अर्घ्य चढ़ाय करूँ नित ध्यान ||
ॐ ह्रीं फाल्गुन-कृष्ण-सप्तम्यां केवलज्ञान-मंडिताय श्रीचद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
शुक्ला-फाल्गुन-सप्तमि के दिन, ललितकूट शुभ उत्तम-थान |
श्री जिन चंद्रप्रभु जगनामी, पायो आतम शिव-कल्याण ||
वसु कर्म जिन चन्द्र ने जीते, पहुँचे स्वामी मोक्ष-मँझार |
निर्वाण महोत्सव कियो इंद्र ने, देव करें सब जय-जयकार ||
ॐ ह्रीं फाल्गुन-कृष्ण-सप्तम्यां मोक्षमंगल-मंडिताय श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
श्रावण-सुदी-दशमी को प्रभु जी, प्रकट भये देहरे में आन |
संवत तेरह दो सहस्र ऊपर,शुभ गुरुवार को ता दिन जान ||
जय-जयकार हुर्इ देहरे में, प्रकट हुए जब श्री भगवान् |
चरणों में आ अर्घ्य चढ़ाऊँ, प्रभु के दर्शन सुख की खान ||
ॐ ह्रीं श्रावण-शुक्ल-दशम्यां देहरास्थाने प्रकटरूपाय श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।६।

Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra – ( जयमाला )

हे चंद्रप्रभु! तुम जगतपिता, जगदीश्वर, तुम परमात्मा हो |
तुम ही हो नाथ अनाथों के, जग को निज आनंददाता हो | |१|
इन्द्रियों को जीत लिया तुमने, ‘जितेन्द्र’ नाथ कहाये हो |
तुम ही हो परम-हितैषी प्रभु, गुरु तुम ही नाथ कहाये हो | |२|
इस नगर तिजारा में स्वामी, ‘देहरा’ स्थान निराला है |
दु:ख दु:खियों का हरनेवाला, श्री चंद्र नाम अतिप्यारा है | |३|
जो भावसहित पूजा करते, मनवाँछित फल पा जाते हैं |
दर्शन से रोग नशें सारे, गुण-गान तेरा सब गाते हैं | |४|
मैं भी हूँ नाथ शरण आया, कर्मों ने मुझको रौंदा है |
यह कर्म बहुत दु:ख देते हैं, प्रभु! एक सहारा तेरा है | |५|
कभी जन्म हुआ कभी मरण हुआ, हे नाथ! बहुत दु:ख पाया है |
कभी नरक गया कभी स्वर्ग गया, भ्रमता-भ्रमता ही आया है | |६|
तिर्यंच-गति के दु:ख सहे, ये जीवन बहुत अकुलाया है |
पशुगति में मार सही भारी, बोझा रख खूब भगाया है | |७|
अंजन से चोर अधम तारे, भव-सिन्धु से पार लगाया है |
सोमा की सुन करके टेर प्रभु! नाग को हार बनाया है | |८|
मुनि समंतभद्र को हे स्वामी, आ चमत्कार दिखलाया है |
कर चमत्कार को नमस्कार, चरणों में शीश झुकाया है | |९|
इस पंचमकाल में हे स्वामी! क्या अद्भुत-महिमा दिखलार्इ |
दु:ख दु:खियों का हरनेवाली, देहरे में प्रतिमा प्रकटार्इ | |१०|
शुभ पुण्य-उदय से हे स्वामी! दर्शन तेरा करने आया हूँ |
इस मोह-जाल से हे स्वामी! छुटकारा पाने आया हूँ | |११|
श्री चंद्रप्रभ! मोरी अर्ज सुनो, चरणों में तेरे आया हूँ |
भवसागर पार करो स्वामी! यह अर्ज सुनाने आया हूँ | |१२|
ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
देहरे के श्री चंद्र को, भाव-सहित जो ध्याय |
‘मुंशी’ पावे सम्पदा, मनवाँछित फल पाय ||
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।

।। Iti Shri Chandraprabh Ji Pooja Dehra Tijara ।।

अन्य जैन धर्म पूजा आपके लिए इन्हे भी पढ़े : 

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now