17th Teerthankar Shri Kunthunath Chalisa | श्री कुंथुनाथ चालीसा

Shri Kunthunath Chalisa : हस्तिनापुर नगरी में जन्मे महाराजा शूरसेन एवं महारानी श्रीमती (श्रीकांता) जी के लाड़ले जिनका मंगल स्नान स्वयं सौधर्म इंद्र ने सुमेरु पर्वत पर निर्मल जल से किया। 16 वर्ष तक जिन्होंने मौन व्रत धारण किया था। सम्मेदशिखर जी की ज्ञानधर कूट से निर्वाण प्राप्त किया।  ऐसे कामदेव ,चक्रवर्ती, तीर्थंकर पदधारी श्री कुंथुनाथ स्वामी भक्ति चालीसा हम सभी का कल्याण करे।  इसी मंगल भावना के साथ प्रस्तुत :

श्री कुंथुनाथ चालीसा – Shri Kunthunath Chalisa

दया सिन्धु कुन्थु जिनराज, भव सिंधु तिरने को जहाज।

कामदेव चाकरी महाराज, दया करो हम पर भी आज।।

जय श्री कुन्थु नाथ गुणखान, परम यशस्वी महिमावान ।

हस्तिनापुर नगरी के भूपति, शूरसेन कुरुवंशी अधिपति ।।

महारानी थी श्रीमती उनकी, वर्षा होती थी रतनन की ।

प्रतिपदा वैशाख उजियारी, जन्मे तीर्थंकर बलधारी ।।

गहन भक्ति अपने उर धारे, हस्तिनापुर आये सुर सारे ।

इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, गए सुमेरु हर्षित हो कर ।।

न्हवन करे निर्मल जल लेकर, ताण्डव नृत्य करे भक्ति भर ।

कुंथुनाथ नाम शुभ देकर, इन्द्र करें स्तवन मनोहर ।।

दिव्या वस्त्राभूषण पहनाये, वापिस हस्तिनापुर को आए ।

क्रम क्रम से बढे बालेन्दु सम, यौवन शोभा धारें हितकर ।।

धनु पैतालीस उननत प्रभु तन, उत्तम शोभा धारें अनुपम ।

आयु पिचानवे वर्ष हजार, लक्षण अज धारे हितकार ।।

राज्याभिषेक हुआ विधिपूर्वक, शासन करे सुनीति पूर्वक ।

चक्ररतन शुभ प्राप्त हुआ जब, चक्रवर्ती प्रभु कहलाये तब ।।

एक दिन प्रभु गए उपवन में, शांत मुनि एक देखे मग में ।

इंगित किया तभी अंगुली से, देखो मुनि को कहा मंत्री से ।।

मंत्री ने पूछा जब कारण, किया मोक्षहित मुनिपद धारण ।

कारण करे और स्पष्ट, मुनि पद से ही कर्म हो नष्ट ।।

मंत्री का तो हुआ बहाना, किया वस्तुतः निज कल्याणा ।

चित्त विरक्त हुए विषयों से, तत्व चिंतन करते भावों से ।।

निज सूत को सौपा सब राज, गए सहेतुक वन जिनराज ।

पंचमुष्टि केशलोंच कर, धार लिया पद नगन दिगंबर ।।

तीन दिन बाद गए गजपुर को, धर्ममित्र पड्गाए प्रभु को ।

मौन रहे सौलह वर्षो तक, सहे शीत वर्षा और आतप ।।

स्थिर हुए तिलक तरु जल में, मगन हुए निज ध्यान अटल में ।

आतम में बढ़ गई विशुद्धि, केवल ज्ञान की हो गयी सिद्धि ।।

सूर्यप्रभा सम सोहे आप्त, दिग्मंडल शोभा हुई व्याप्त ।

समोशरण रचना सुखकार, ज्ञान तृप्ति बैठे नर नार ।।

विषय भोग महा विषमय हैं, मन को कर देते तन्मय हैं ।

विष से मरते एक जनम में, भोग विषाक्त मरे भव भव में ।।

क्षण भंगुर मानव का जीवन, विद्युतवत विनसे अगले क्षण ।

सांध्य लालिमा के सद्रश्य ही, यौवन हो जाता हैं अद्रश्य ही ।।

जब तक आतम बुद्धि नहीं हो, तब तक दरश विशुद्धि नहीं हो ।

पहले विजित करो पंचेन्द्रिय, आतमबल से बनो जितेन्द्रिय ।।

भव्य भारती प्रभु की सुनकर, श्रावक जन आनन्दित होकर ।

श्रद्धा से व्रत धारण करते, शुभ भावों का अर्जन करते ।।

शुभायु एक मास की रही जब, शैल सम्मेद पे वास किया तब ।

धारा प्रतिमा योग वहां पर, कटा कर्म बंध सब प्रभुवर ।।

मोक्षकल्याणक करते सुरगण, कूट ज्ञानधार करते पूजन ।

चक्री कामदेव तीर्थंकर, कुंथुनाथ थे परम हितकर ।।

चालीसा जो पढ़े भाव से, स्वयं सिद्ध हो निज स्वाभाव से ।

धर्म चक्र के लिए प्रभु ने, चक्र सुदर्शन तज डाला ।।

इसी भावना ने अरुणा को, किया ज्ञान में मतवाला ।।

।। Shri Kunthunath Chalisa – श्री कुंथुनाथ चालीसा ।।


जैन धर्म के प्रभावशाली चालीसा भी पढ़े : 

  1. महाअतिशयकारी श्री आदिनाथ भगवान चालीसा ( चाँदखेड़ी )
  2. अविचल कूट से मोक्ष पधारे श्री सुमतिनाथ भगवान चालीसा
  3. शौरीपुर में जन्मे द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ चालीसा
WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now